भगवान श्रीकृष्ण का यादव वंश - Shri Krishna Yadav Clan

प्राचीन भारत की सारगर्भित संरचना में आर्य जाति का बहुत महत्व है। भारत भूखण्ड में इनका सरवत्र फैलाव था। आर्य ऋषियों का जीवन विद्या और संयम को समर्पित था। वे प्रायः एकान्त आश्रमों में रहते, देवताओं से अपनी योगिक शक्तियों से सम्पर्क साधते और सत्य, यज्ञ तथा तप जीवन मार्ग का उपदेश देते और इसे ही धर्म की संज्ञा देते और समझते थे। 
साहसिक आर्य राजाओं ने जब उत्तर-भारत में समर्थ राज्यों की स्थापना की, उसके बहुत पहले ही यादव जाति के लोग गंगा के पार पहुँच चुके थे। इनमें ‘शूरों, अन्धको और वृष्णियों की संघबद्ध जातियाँ प्रमुख रूप से थी’। 
इन संगठित यादव जातियों ने यमुना की तराई के जंगल साफ किये और वहाँ अपनी बस्तियाँ बसाई। शूरों के नाम पर उन्हें शूरसेन कहाँ गया और वह अन्य यादव सरदारों से अधिक शक्तिशाली थे, उन्होने मथुरा को जीता। मथुरा के यादव सरदारों पर किसी श्राप का प्रभाव था इसलिए उनमें कोई राजा नहीं होता था और वे आपस में एक परिषद के द्वारा राज काज चलाते थे। फिर भी अन्धक जाति के सरदार ‘उग्रसेन’ को शिष्टता वश राजा कहा जाता था।

उग्रसेन का पुत्र कंस अत्यन्त दुःसाहसी, क्रोधी और महात्वाकांक्षी था। अपने पराक्रम से उसने स्वयं और मथुरा की ख्याति को बढ़ाया और मगध सम्राट जरासंध की दो पुत्रियों (अस्ति तथा प्राप्ति) से विवाह किया। जरासंध संसार भर के राजाओं को अपने अधीनस्थ करने की लालसा रखता था और कंस उनकी इस योजना को फलीभूत करने में पूर्ण सहयोग प्रदान करता था। 

शूर जाति के पराक्रमी सरदार शूर ने (नागराज आर्यक) की कन्या (मारिषा) से विवाह किया। उससे उन्हें (वसुदेव और देवभाग) नामक दो पुत्र हुये तथा (पृथा और श्रुतश्रवा) नामक दो पुत्रियाँ प्राप्त हुयीं। 

आगे चल कर (पृथा को राजा कुन्ति भोज ने गोद ले लिया), इसी से आगे चलकर पृथा कुन्ती के नाम से प्रसिद्ध हुयी। उनका विवाह हस्तिनापुर के कुरूवंश के राजा पाण्डु के साथ हुआ। 

शूर की दूसरी कन्या श्रुतश्रवा का विवाह (चेदि नरेश दामघोष) के साथ हुआ। इनके (शिशुपाल) नाम का पुत्र हुआ। 

शूर के ज्येष्ठ पुत्र वसुदेव का उग्रसेन के भाई देवक की कन्या देवकी के साथ विवाह हुआ। 

कंस की चचेरी बहन देवकी का आठवा पुत्र उसे मार डालेगा, इस भविष्यवाणी को असत्य करने के लिए कंस ने वसुदेव और देवकी को कारागार में डाल दिया और उनके छः पुत्रों की जन्म लेते ही हत्या कर दी। 
देवकी की सातवी सन्तान को समय से पहले ही गर्भ से बाहर निकालकर वसुदेव की पहली पत्नी रोहिणी के पास पहुंचा दिया गया। (यह सन्तान बड़ी होकर बलराम-संकर्षण कहलाये।) 

वसुदेव और देवकी की आठवी सन्तान के रूप में भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ। वे आगे चलकर यादवों के उद्धारक हुये। आधी रात के समय भगवान श्री कृष्ण का जन्म होते ही उन्हे गोकुल पहुंचा दिया गया, जहाँ गोपालकों के सरदार नन्द और यशोदा के घर उनका लालन-पालन हुआ। 

देवभाग जो कि वसुदेव के छोटे भाई थे के पुत्र उद्धव कहलाये वे कृष्ण के अत्यन्त प्रिय थे। 

सोलह वर्ष की आयु में भगवान श्रीकृष्ण कंस के निमन्त्रण में मथुरा आये और उन्होने दुष्ट कंस का संहार किया। 

भगवान श्रीकृष्ण, उनके बड़े भाई बलराम, उनके बचपन के परममित्र उद्धव अपनी शिक्षा-दीक्षा के लिए गुरू सान्दीपनि के आश्रम में गये। गुरूदक्षिणा के रूप में भगवान श्रीकृष्ण ने अद्भुत पराक्रम का प्रदर्शन कर सागर के दानवों से उनके पुत्र पुर्नदत्त की रक्षा की। 

कंस की मृत्यु का समाचार जब जरासंध को मिला जिनका कंस जमाता था तो उसकी मृत्यु का बदला लेने के लिए उसने मथुरा पर आक्रमण कर दिया। जरासंध उस समय भारतवर्ष का सबसे शक्तिशाली राजा था और यादवों के पास उसका सामना करने की शक्ति नहीं थी। मथुरा के विधवंस को टालने के लिए बलराम और श्रीकृष्ण मथुरा छोड़कर सहयाद्रि घाटी के पार गोमन्तक में जाकर गरूण जाति के लोगों के साथ रहने लगे। वहाँ पर भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारिका नामक बहुत ही सुन्दर नगरी की स्थापना की और सभी यादव सरदारों को पुनः संगठित किया। 

यादवों के विनाश के लिए जरासंध ने विदर्भ के राजा भीष्मक और चेदि के राजा दामघोष के साथ अपनी मैत्री को सुदृढ़ करने का निश्चय किया। जरासंध ने प्रस्ताव किया कि भीष्मक की पुत्री रूक्मिणी का विवाह चेदि राज दामघोष के पुत्र शिशुपाल के साथ और अपनी पौत्री का विवाह भीष्मक के पुत्र रूक्मी के साथ हो जाये। इसको मूर्त रूप देने के लिए विदर्भ की राजधानी कुण्डिनपुर में एक स्वयंवर का आयोजन किया गया। असल में वह स्वयंवर विधि का मात्र दिखावटी अनुकरण था क्योंकि रूक्मिणी को पहले से तय शिशुपाल के गले में ही वरमाला डालनी थी। भगवान श्रीकृष्ण कुछ शक्तिशाली यादव सरदारों के साथ अकस्मात कुण्डिनपुर पहुँच गये और उन्होने रूक्मिणी का हरण कर द्वारिका ले आये और उनसे विवाह कर लिया। 

जरासंध इस प्रकरण से और अधिक क्रोधित हो गया उसने निश्चय किया कि इस बार वह मथुरा का पूर्णतया सर्वनाश कर देगा, इसके लिए उसने अपने समान शक्तिशाली और क्रूर सिन्धु पार के राजा कालयवन के साथ समझौता किया। उसके अनुसार यह निश्चित हुआ कि कालयवन पश्चिम और जरासंध पूर्व दिशा से मथुरा पर आक्रमण कर इसे पूर्णतया जलाकर के राख कर देंगे। 

भगवान श्रीकृष्ण इस बात से भलिभाँति वाकिफ थे कि इन दो प्रचण्ड शक्तिशाली शत्रुओं के बीच यादवों का बचना बिल्कुल नामुमिकन है, इसलिए वे यादवों को अपने साथ दलदलों और मरूभूमि के पार सुदूर सौराष्ट्र ले गये। 

यहाँ वे कुकुद्दीन के राज्य में बस गये, इन्ही की कन्या रेवती के साथ बलराम का विवाह हुआ और द्वारिका इसी राज्य के वैभवशाली राजधानी विकसित हुयी। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने यदुवंशियों को सुरक्षित एवं पूर्णतया सामर्थ वान बनाया। उधर कालयवन मथुरा नहीं पहुच सका, भगवान श्रीकृष्ण ने कूटनीति से उसे मुचकुन्द ऋषि के कोप का भाजन बना दिया और ऋषि मुचकुन्द ने उसे उनकी हत्या के प्रयास करने के लिए कालयवन को अपनी योगिक शक्ति से भस्म कर दिया। 

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