Kuruvansh in Hindi - कौरव कौन थे - कौरव वंश

भारतवर्ष को भारत नाम कुरूवंश के महाप्रतापी राजा भरत के नाम पर पड़ा। महाराजा भरत ने सभी राजाओं पर चक्रवर्तित्व स्थापित किया और कुरूवंश की स्थापना की। सम्राट भरत के एक वंशज हस्ति ने गंगा के तट पर हस्तिनापुर नामक नगर बसाया। आगे चलकर भरतवंश ही कुरूवंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

हस्ति के वंशज शान्तनु भी एक महान प्रतापी राजा थे। उनका विवाह आगे चलकर माँ गंगा से हुआ जिससे उन्हें गांगेय (गंगा पुत्र भीष्म) नामक एक धर्मनिष्ठ, पराक्रमी और शक्तिशाली पुत्र प्राप्त हुआ। 

परिपक्व अवस्था में महाराजा शान्तनु को एक धीवर कन्या से प्रेम हो गया, जो कि मत्सय गंधा के नाम से प्रसिद्ध थी, जो बाद में सत्यवती के नाम से जानी गयी। महर्षि पराषर के आर्शीवाद से सत्यवती योजन गंधा के नाम से भी प्रसिद्ध हुयी। सत्यवती के पिता महाराजा शान्तनु से अपनी पुत्री के विवाह के लिए सहमत नहीं थे, उन्होने शर्त रखी कि वे अपनी कन्या का विवाह उनसे तभी करेंगे जब उसकी पुत्री का भावी पुत्र ही सिंहासन का अधिकारी बनेगा। महाराजा शान्तनु का दुःख दूर करने के लिए गंगेय ने यह प्रतिज्ञा कि वे आजीवन अविवाहित रहेंगे और अपने जीवनकाल में कभी सिंहासन ग्रहण नहीं करेंगे। उनकी प्रतिज्ञा इनकी कठिन थी कि वे समान्यजन के बीच में भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुये। 

शान्तनु और सत्यवती से चित्रांगद और विचित्रवीर्य नाम के दो पुत्र हुये, चित्रांगद यौवन काल में ही एक युद्ध में मारा गया। भीष्म ने विचित्रवीर्य को हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठाया और काशीराज के दो कन्याओं का हरण कर उनका विवाह बालपन में ही विचित्रवीर्य से कर दिया। विचित्रवीर्य भी अल्पआयु में निःसन्तान रहते हुये मृत्यु को प्राप्त हुये। 

गंगापुत्र भीष्म सिंहासन पर न बैठने और विवाह न करने की प्रतिज्ञाबद्ध थे इसलिए उनके परामर्श से साम्रज्ञी सत्यवती ने ऋषि पराशर और उनके संसर्ग से उत्पन्न ज्ञानावतार अपने पुत्र कृष्ण द्वैपायन व्यास को बुलाकर प्राचीन प्रथा के अनुसार विचित्रवीर्य की दोनो विधवाओं से एक-एक पुत्र उत्पन्न करवाया। 

कृष्ण द्वैपायन व्यास का पालन पोषण ऋषि पराशर की देखरेख में वैदिक ऋषि परम्परा से हुआ था, अपनी विद्ववता और कठोर तपस्या से वे आर्यावर्त में समस्त ऋषियों में सर्वोच्च स्थान को प्राप्त किया। आगे चलकर उन्होने चारों वेदों, 18 पुराण, विश्व के विशालतम धर्म ग्रन्थ - महाभारत का संकलन किया।

माता सत्यवती के आदेश पर प्राचीन परम्परा नियोग विधि के द्वारा कृष्ण द्वैपायन व्यास ने विचित्रवीर्य की पहली पत्नी अंबिका से धृतराष्ट्र नामक पुत्र उत्पन्न किया जो कि जन्म से ही नेत्रहीन थे। विचित्रवीर्य की दूसरी पत्नी अंबालिका से पाण्डु नामक पुत्र का जन्म हुआ, वह जन्मजात रोग ग्रसित था। राजमहल की एक धर्मपरायण दासी जो कि कृष्ण द्वैपायन व्यास की अनुगामी थी उसने भी पुत्र प्राप्ति के लिए भक्तिभाव से समपर्ण किया उससे विदुर नामक अत्यन्त विद्ववान और धर्मधुरीण पुत्र प्राप्त हुआ। 

नेत्रहीन होने के कारण धृतराष्ट्र राज सिंहासन के उत्तराधिकारी नहीं हो सकते थे अतः कुरूश्रेष्ठ भीष्म पितामह ने राज्य सिंहासन पर पाण्डु का अभिषेक किया और पाण्डु ने बुद्धिमता और कुशलता से शासन कर अत्याधिक लोकप्रियता हासिल की, बड़े होकर विदुर अत्यधिक बुद्धिमान और कुटनीति पारंगत महामंत्री सिद्ध हुये। 

धृतराष्ट्र का विवाह गांधार नरेश की पुत्री गांधारी से हुआ। जिससे उन्हे दुर्याेधन, दुःशासन, आदि 100 पुत्र और दुशाला नामक पुत्री प्राप्त हुयी। 

पाण्डु ने भगवान श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव की बहन कुन्ती और मद्रदेश की राजकुमारी माद्री से विवाह किया। पाण्डु को वैवाहिक जीवन का सुख न भोग सकने का श्राप था। अतः वह राज्य त्याग कर अपनी दोनो पत्नियों के साथ हिमालय चले गये। पाण्डु की सम्मति से विभिन्न देवताओं की कृपा से कुन्ती को तीन युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन और माद्री को जुड़वा नकुल और सहदेव पुत्र प्राप्त हुये। पाण्डु की मृत्यु होने पर माद्री ने सती धर्म का पालन करते हुये प्राण त्याग दिये। हिमालय के ऋषिगण कुन्ती और पाँचों पुत्रों को लेकर हस्तिनापुर आये। पाँचों पुत्र बड़े होकर अत्यन्त धर्मनिष्ठ और रणकुशल व विवेकशील हुये और सभी के प्रिय पात्र बने। इन सबके कारण वे दुर्याेधन तथा उनके अन्य भाइयों के ईष्र्या और द्वेष स्थापना का भी कारण बने। 

पाण्डवों को कुरूओं में बड़ी लोकप्रियता मिली। पाण्डवों में सबसे बड़े युधिष्ठिर, धर्मराज के नाम से जब विख्यात हुये। भीष्म पितामह ने उन्हे हस्तिनापुर के युवराज के पद पर अभिषिक् किया।         

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