Draupadi - द्रोपदी के पिता की प्रतिज्ञा

प्राचीन भारत में आर्यवर्त भूखण्ड के दो राज्य सबसे अधिक प्रसिद्ध और शक्ति सम्पन्न थे। एक था भरतों का कौरव वंश और दूसरा था पांचल राज्य, जिसके राजा दुप्रद थे। गंगा के दक्षिणी भाग की भूमि पर पांचालों का अधिकार था। कुरूओं के बाद वे ही सबसे अधिक समृद्ध और शक्तिशाली थे। उनकी राजधानी काम्पिल्य थी। 
राजा द्रुपद अत्यन्त कठोर स्वभाव के थे। वे किसी को क्षमा करना नहीं जानते थे। उन्होने वर्षों से एक अपमान की स्मृति अपने अन्तः मन में संजो रखी थी। 
गुरूकुल में जब वे अध्ययनरत थे तब आचार्यद्रोण उनके परम मित्र थे। आचार्यद्रोण भरद्वाज नामक एक विद्वान ब्राहामण के पुत्र थे। नवकिशोरावस्था की भावकुता में दोनों मित्रों ने एक दूसरे को वचन दिया कि वे अपने जीवन के सभी ऐश्वर्य, धन धान्य एवं अन्य संसाधानों को परस्पर बराबर बाँटकर उपभोग करेंगे। अध्ययन पूरा हुआ और दोनों अपने-अपने जीवन के मार्ग में चले गये। द्रुपद आगे चलकर अपने शक्तिशाली और सम्पन्न राज्य के राजा बने।
वहीं आचार्य द्रोण शस्त्र विद्या के पूर्ण और अपरिमार्जित आचार्य बनने के पश्चात भी जीवन यापन के समुचित संसाधानों का संकलन करने में अपने को असमर्थ पा रहे थे। उनका विवाह आचार्य कृपाचार्य की बहन कृपी के साथ हो चुका था। वे एक नन्हे बालक के पिता बन चुके थे परन्तु योग्य कार्य न मिलने के कारण एक दरिद्र ब्राहामण का जीवन व्यतीत कर रहे थे। इसी उधेड़बुन में उन्हें अपने परम मित्र द्रुपद के गुरूकुल में दिए हुए वचन याद आये और वे द्रुपद से मिलने काम्पिल्य पहुँचे। उन्होनें द्रुपद को उनका वचन याद दिलाया और उसे पूर्ण करने को कहा। राजा द्रुपद ने राजकीय ऐश्वर्य के बटवारे की द्रोण की माँग को अस्वीकार कर दिया और उन्हें तिरस्कृत कर अपने राज्य से जाने को कहा।
यह अपमान आचार्य द्रोण के मन में एक सर्पदंश की भाँति हमेशा वेदना पहुँचाता रहा और वह उसे कभी भूल नहीं पाये। इस अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए उन्होने सर्व पराक्रमी भगवान परशुराम से शस्त्र विद्या की दीक्षा ली और धनुर्विद्या के आर्यावर्त के सबसे महान और सर्वश्रेष्ठ श्रेणी में आसीन हुये। 
कालान्तर में उनका सम्पर्क कुरूश्रेष्ठ भीष्म पितामह से हुआ और भीष्म पितामह उनकी धनुर्विद्या से इतने प्रभावित हुये कि उन्होने उन्हे धृतराष्ट्र और पाण्डु के पुत्रों को धनुर्विद्या की शिक्षा देने के लिए उनका गुरू नियुक्त किया। 
आगे चलकर जब कुरू राजकुमारों की शस्त्र शिक्षा पूर्ण हुयी और वे अजेय योद्धा बन गये तब आचार्य द्रोण ने गुरू दक्षिणा के रूप में राजा द्रुपद को बन्दी बनाकर उनके सामने लाने का संकल्प लिया। 
गुरू के आदेश को पूर्ण करने के लिए पाण्डवों में अर्जुन जो कि पाँचों भाइयों में और आचार्य द्रोण के सभी शिष्यों में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे। पांचाल राज्य पर आक्रमण करके राजा द्रुपद को बन्दी बना लिया और उन्हें द्रोणाचार्य के सम्मुख उपस्थित किया। आचार्य द्रोण ने राजा द्रुपद से उनसे क्षमा याचना, जीवन दान और मुक्ति धन के रूप में गंगा के उत्तरी तट का पांचाल प्रदेश अपने लिए मांग लिया। राजा द्रुपद को बन्दी मुक्त होने के लिए द्रोण की सभी मांग माननी पड़ी परन्तु इस अपमान के अवशेष उनके अन्तः हृदय में हमेशा के लिए स्थापित हो गये। 
द्रुपद ने आगे चलकर घोर तप और यज्ञ के द्वारा, यज्ञ से प्रकट धृष्टधुम्न नामक पुत्र और याज्ञसेनी नामक पुत्री को प्राप्त किया। जो आगे चलकर याज्ञसेनी द्रौपदी कहलायी। द्रुपद अपने अपमान और वैमनस्य की जड़े बाल्यकाल से ही अपने पुत्र धृष्टधुम्न और द्रौपदी के मन में समाहित करने लगे। अपने पिता का संकल्प पूर्ण करना ही उनके जीवन का मुख्य ध्येय हो गया। 
अपने पिता कि प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिए द्रौपदी जो कि - सांवल स्वरूपा, गरिमामयी और अपूर्व सुन्दरी थी - निश्चय किया कि वह आर्यावर्त के सर्वश्रेष्ठ धर्नुधर व योद्धा से ही विवाह करेगी।
भीष्म पितामह के संरक्षण में कुरूगण अत्यधिक शक्तिशाली थे। आचार्य द्रोण से शस्त्र शिक्षा प्राप्त करने के बाद कौरव और अधिक प्रभावशाली हो गये। 
द्रुपद ने अनुभव किया कि अब वे अधेड़ा अवस्था की तरफ बढ़ रहे हैं। समस्त प्रयत्नों के पश्चात् भी उनके पुत्र अतिविशिष्ट योद्धाओं की श्रेणी को प्राप्त नहीं कर सके थे। द्रौपदी भी अपने पूर्ण यौवन काल में प्रवेश कर चुकी थी परन्तु द्रुपद कोई ऐसा वर नहीं ढूंढ सके थे जो उनकी और उनकी पुत्री की आकांक्षाओं में पूर्ण हो। 
उधर हस्तिनापुर के युवराज पद पर पाण्डवों में अग्रज युधिष्ठिर का अभिषेक हो गया एवं अर्जुन का यश एक सर्वश्रेष्ठ योद्धा के रूप में पूरे आर्यावर्त में गुंजायमान हो रहा था। इससे द्रुपद और अधिक निराश और क्रोधित हो गये। उन्होने अपने संकल्प को और अधिक कठोर कर लिया।
समय बीतता गया, एक दिन गुरू सान्दीपनि द्रुपद की राज्य सभा में पधारे, वे आर्यावर्त के सबसे प्रसिद्ध विद्यालय के कुलपति थे और वहाँ होनहार शिष्यों को वेदो और शास्त्रों के साथ शस्त्र संचालन और युद्ध नीति की शिक्षा दी जाती थी। 
सान्दीपनि आर्यावर्त के विभिन्न राज्यों में पद यात्रा करते हुये गुणी शिष्यों का चुनाव करते थे। वे वर्षा ऋतु में अवन्ती में रहते थे जहाँ उनका आश्रम था, एक या दो माह सागर तट पर प्रभास क्षेत्र में बीताते थे। कुछ सप्ताह कुरूक्षेत्र में ज्ञानावतार महर्षि वेदव्यास के आश्रम में ठहरते थे। गुरू सान्दीपनि इस बात का विशेष ख्याल रखते थे कि वह हर वर्ष कम से कम एक माह पांचाल राज्य की राजधानी काम्पिल्य में बीताये क्योंकि उनका राजा द्रुपद पर विशेष अनुग्रह था। 
राजा द्रुपद एक कठोर अनुशासन से अनुशासित व्यक्ति थे वह धर्म की अपरिमार्जित परम्पराओं के द्वारा पांचाल का शासन करते थे। वे गुरू सान्दीपनि का विशेष आदर करते थे। सान्दीपनि जब तक काम्पिल्य में ठहरते, वहाँ के योद्धाओं को शस्त्र विद्या का आधुनिकतम ज्ञान प्रदान करते। गुरू सान्दीपनि क्योंकि हर वर्ष आर्यावर्त के सभी राज्यों का भ्रमण करते थे। इसलिए वे शस्त्रों तथा आर्यावर्त के राजाओं और उनकी सैन्य सम्बन्धी तैयारी एवं विशेष योद्धाओं के बारे में पूर्ण जानकारी रखते थे। इस बार जब वे काम्पिल्य पधारे तो राजा द्रुपद ने अपने हृदय की निराशा और कटुता उनके सामने व्यक्त की। उन्होंने बताया कि वे द्रौपदी का विवाह किसी अन्यतम और अपराजेय योद्धा के साथ करना चाहते है, यह कहते हुये उनके क्षीण मुखमण्डल और उनकी आँखों में एक प्रच्छन्न घृणा और अवसाद के भाव चमकने लगे। 
उनके विचारों को सुनने के पश्चात् गुरू सान्दीपनि ने उन्हे बताया कि वे जितने भी तरूण योद्धओं को जानते है उनमें पाण्डव पुत्र अर्जुन धर्नुविद्या और युद्ध विद्या में देवताओं के समान अलौकिक दक्षता रखते है। राजा द्रुपद कि अधीरता देखकर सान्दीपनि ने साहनुभूति पूर्वक उन्हे बताया कि अर्जुन जैसा एक और तरूण योद्धा है जो हर प्रकार उसकी बराबरी कर सकता है और उसका नाम कर्ण है किन्तु वह सूत पुत्र है और धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन का अनन्य मित्र है और दुर्योधन ने उसे अंग देश का राजा बना दिया है परन्तु वह मित्र ऋण से अनुगत है।

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